Saturday, 29 October 2016

दीपावली शुभकामना......

                      जीवन अनगिनत श्याह प्रतिबिम्बों से आंख मिचैली के साथ अनवरत गतिमान है। मन का क्रम भ्रम के भवर में घिर अधीर हो ठहर जाता किन्तु समय सतत गतिमान है।इसी धीर अधीर मन  को नए उत्साह से लबरेज कर पुनः उत्साहः के नव प्रकाश भविष्य के राह आलोकित हो जिससे हर्ष दीप प्रज्वलित रहे त्योहारो की श्रृंखला को  सम्भवतः जीवन दर्शन में समाहित किया है। दीपोत्सव में दैदीप्यमान अनगिनत प्रकाश बिम्बों की श्रंखला भविष्य के गर्त में छिपे तम को परास्त कर  ऐसे उदित संसार का शृजन कर सके जहाँ हर किसी को उसके भाग खुशियो की लड़िया फुलझड़ी की भांति खिलखिला सके। फटाकों की प्रतिध्वनित आवाज कानो को ही न गुंजित कर दिल के तार को भी झंकृत कर सके जिससे जीवन संगीत में सतत नए धुन का प्रवाह हर पल खुशियो के लय ताल से तरंगित हो सके। आपके कुछ दीप उन नामो को भी समर्पित हो जिनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष भाव कही न कही हमारे खुशियों के कारणों के कारक हो। भावो के प्रकाश हर किसी को उसके हिस्से का अलोक दे ऐसे दीप के अलख ज्योति से चहुँ दिशा दैदिप्तमान हो। आप सभी को दीपावली के पर्व की हार्दिक शुभकामना।  
        

Tuesday, 25 October 2016

ग्रेट महाभारत शो

                         
                    मनसुख के हाथ में अखबार का आधा भाग पड़ा था। मनसुख कुछ गौर से उसमे पढ़ने की कोशिस  कर रह था।  तब तक बगल में बैल के नाद में चारा मिलाते -मिलाते काका ने मनसुख से कहा - का रे जब पढ़े के रहे तो खेत में भगता था अब का ओ हे में पढ़ने की कोशिस कर रहा है। मनसुख को पता है कोई काम न भी हो तो काका बिना टोके रुकने वाले कहाँ है। मनसुख बोला न काका पढ़िए लेते तो का हो जाता। ई सब तो पढ़ले लिखल है जकरा हम रोज केहू न केहू बहाने कोसते रहते है। सबके नजर में तो सारे दिक्कत के जड़ तो यही पढ़ल लिखल बाबू सब है। का बात है मनसुख आज तो बड़ा बुद्धिमानी वाला गप्प हांक रहा है है -काका बोले। 
मनसुख -का काका हमारे बुद्धि पर कोनो शक है का। 
काका -नै रे फिर भी ई तो बता का लिखल है ई फाटल अखबार में। 
मनसुख -न काका हमको ई नहीं समझ आ रहा की परिवार में सब देश के लिए लड़ रहा, देखो देश सेवा के लिए सब कितना मेहनत कर रहे है। और ई अखबार वाले इनको कोस रहे है।  बेटा तो सब बात मानने के लिए तैयार है लेकिन बाबूजी है की मानते नहीं। ई तो काका महाभारत से भी ज्यादा गांठ वाला परिवार लग रहा है। थोड़ा कलियुग है इसलिए लगता है कहानी कुछ उलट सा गया है। यहाँ पता नहीं धृतराष्ट को किससे मोह है देश से की बेटा से की भाई से । काका अब तक तो ध्यान से सुनकर समझने की कोशिस कर रहे थे किन्तु कुछ पल्ले नहीं पड़ने से झुलाकर बोले -अरे का बात लिखा है साफ़ साफ़ बता। हम कोनो कहानी नहीं पूछ रहे। 
मनसुख -हाँ काका ओहि तो बता रहे है। अब तो समाचार भी कहानी जैसे ही हो गया है। अब काका बात ई है की हमको भी ठीक से कुछ समझ में नहीं आ रहा है। पहले तो ई महाभारत जैसा लग रहा था किन्तु भाई-भाई का प्यार देख लगने लगा की रामायण है। अब काका ई दोनु का मिक्स कहानी है। काका मनसुख को समझने की कोशिस में लग रहे है। 
मनसुख आगे बोला -अब काका बात अइसन है की बात तो बस राजगद्दी के ही है जैसे की रामायण और महाभारत में था। किन्तु यहाँ अब पुत्र प्रेम किसी कारण से शायद कलयुग का प्रभाव है मित्र प्रेम में ज्यादा बदल गया है। इस कहानी में तो सब भगवान ही छाये है। कही रामजी है तो कही शिवजी,गोपाल भी है कृष्ण वाला रूप में अर्जुन को समझा भी रहे और साथ भी है। बेटा का संस्कार है की अभी तक अपने पिता से काफी नरमी और मुलायम से पेस आ रहा है। लेकिन अपने पिताजी के अमर प्रेम से थोड़ा शर्मिदगी महसूस कर रहा है। दुनिया के लांछन से डरकर पिताजी को समझने की कोशिस में है लेकिन बाबूजी है की मान नहीं रहे। अब काका का सब्र जवाब दें रहा था कुछ -कुछ त्योरी चढ़ा कर बोले -अरे तू यही बकवास कर रहा है हम अखबार का समाचार पूछ रहे और तू है की किसी के घर के बंदरवाट का कहानी सुना रहा है। यहाँ तो रोजे किसी के घर में ई सब झगड़ा चलते रहता है। तू कोनो नहीं जानता है क्या। 
मनसुख -काका तू बेकार में खौजियाते रहते हो अब यही समाचार लिखा है तो का बताये। अब तोहे पढ़ना आता है तो पढ़ लो।काका तो ठहरे कला अक्षर भैस बराबर ,बोले अच्छा आगे बता। 
मनसुख -तो काका ओहि तो बता रहे। अखबार कहता है की झगड़ा का कारण का है ई तो पता नहीं। लेकिन सब सुलह में लगे है ,लेकिन दिक्कत है की यहाँ कृष्ण तो साथ है लेकिन अभी तक अर्जुन को गीता ज्ञान नहीं दिए। अभी तो बस सुलह का दौर चल रहा है। अब देखे इस नौटंकी में कब अर्जुन  सामने हाथ में गांडीव धारण कब युद्ध के  ललकार दे। ई काका ग्रेट महाभारत शो चल रहा है, वैसे भी भगवान् तो कह ही गए है कि ई यदु वंश तो आपसे में लड़ कट मिटेगा। अब देख तो सब रहा है लेकिन समझाता काहे नहीं ई नहीं समझ में आता है। जनता भी आनंदित होकर इस नौटंकी को देख मजे लेने में लगी है। ई भी जरुरी है न जब परिवार नहीं तो गांव कैसा और गांव न तो शहर कैसा और शहर न तो प्रदेश  कैसा। इसलये सब मिलकर पहले परिवार बचाने में लगे है ताकि प्रदेश बचे। कुछ दिन राज काज रुकिए जाएगा तो कोनो सुनामी थोड़े ही आ जायेगा। सो सबकुछ छोड़छाड़ कर अब इसको सब सुलझाने में लगे है। वैसे भी यहाँ तो सब भगवान् भरोसे ही चलता है। 
  किन्तु काका के दिमाग में अब भी कुछ नहीं पल्ले परा और वो बैल को चारा देकर अपने दूसरे काम के लिए चल दिए। जबकि मनसुख उस अख़बार में कोई और कहानी तलाश रहा था।  

Monday, 10 October 2016

विजयादशमी ......

      सुबह से हर्षोल्लास  गांव में छाया हुआ है। समय करवटे बदल रहा है। सब कुछ पूर्ववत है, किन्तु जीवन की रफ़्तार बढ़ाने को आतुर सब ।सब खुश नजर आ रहे है। मनसुख भी खुश है। आज विजयादशमी है। महिषाषुर मर्दन के बाद आज फिर से एक बार रावण जलने को तैयार है। बचपन से ही मनसुख गांव में इस उत्सव को  देखता आ रहा है। पहले मेला का अपना ही आनंद होता था और रावण के जलने से ज्यादा मजा मेला में आता था। किन्तु समय के साथ साथ बहुत कुछ बदल गया लेकिन रावण बार -बार जलने के बाद भी आज फिर से एक बार विजयी मुद्रा में सामने के मैदान में खरा है। धर्म में मनसुख को पूरा आस्था है। किन्तु फिर भी बार -बार रावण का जलन उसे बैचैन करता है। 
  वह मैदान की ओर बढ़ा चला जा रहा है। भीड़ में बच्चे बूढ़े सभी अपने लिए एक उपयुक्त जगह को तलाश रहा है की रावण को लगते बाण और उठते चिंगारी का पूरा आनंद ले सके। काका पहले ही उस भीड़ में खो चुके है। मनसुख की नजर जगह के साथ -साथ काका को भी ढूंढ रहा है। उस भीड़ में रावण के पुतले को देखते हुए उसकी कई छाया कृति भीड़ में मनसुख के नजरो में तैरने लगा। मनसुख सोच रहा था यह आयोजन क्या बदहाली से झुंझते लोगो का मतिभ्रम कर देता या लोग वास्तविकता को भुलाने का बहाना ढूंढता है। तब तक भीड़ में मनसुख को काका नजर आ गए। मनसुख जोर से चिल्लाया -काका ओ काका ,काका पलट के मनसुख को देखा और इसारे से कहा आते है। 
काका बड़ी मुश्किल से भीड़ में जगह बना कर मनसुख के पास पहुचे। 
काका- कहाँ था अब तक कब से हम तुको खोज रहे है। 
मनसुख-बस काका अबिहे आये है। अच्छा चल आगे चले। दोनों और थोड़ा आगे सरकने लगे। तबतक दूसरी ओर से राम सबके साथ पुरे तैयार हो मैदान के अंदर आने लगे। लोगो के दंडवत के उत्साह को देखकर मनसुख काका से पूछा -ई का कर रहा है। 
काका- पूजा ,और का मांग रहा है की हे भगवान् कुछ तो दे। लेकिन काका ई तो मंडली वाला राम है। कोनो असली थोड़े।  अरे बुड़बक ई तो सब जनता है और वो भी। लेकिन लोग अब मन से कमजोर हो गया न कुछ पूछने का ताकत है न करने का। तो जहाँ भी मौका मिलता है बस हाथ जोड़के माँगने बैठ जाते। उहो देख हाथ उठाके कैसे आशीर्वाद दे रहा है जैसे बस उसका सारा मनोरथ अब पुरे हो जाएगा। देखता नहीं इलेक्शन टाइम में कैसे हम भगवान् हो जाते और ई नेतवन सब हाथ जोरे और हम भी बिना कुछ पूछे इनको भोट का आशीर्वाद दे देते। तभी तो ई हालात है। 
पर काका हर साल ई ड्रामा रावण जलाने का जो होता है लगता है फिर भी रावण और बढिए रहा है। मनसुख कहा - देख रावण तो फिर भी ज्ञानी लेकिन अहंकारी था कहते है। लेकिन अभी के जो रावण है अज्ञानी ,महामूर्ख है। अब बेटा धर्म और अधर्म अपने अपने खांचे में रखकर देखने लगे है। जो हमारे मतलब को सिद्धकरे अब वही धरम है। ई बेचारा रावण तो हर साल ऐसे ही जलता है। देख एक ठो कुबेर पैसा ले के भाग गया। पकड़ो-पकड़ो सब चिल्लाए लेकिन पकड़ेगा कोई नहीं। ऐसा कितना तो रोजे हो रहा है। अचानक देख कैसे मनोबल बढ़ा की अब हर कोई राम कम और रावण की जरुरत ज्यादा महसूस कर रहा है। अब हर गली कूँचे में राम के नाम पर रावण लड़ रहे है।  
तब तक एक तीर चला और सीधे बिच में खड़े रावण को भेद दिया। फटाको की आवाज में चिंगारिया धूं -धूं कर उठने लगा.मनसुख और काका की नजर उसी ओर टिक गया। लोगो की टोली जोर-जोर से ताली बजाकर खुश हो रहे थे। 
जलते रावण और खुश होते लोग को देख मनसुख दिग्भ्रमित था और रावण से निकलते लपटो को देख कर सोच रहा था की इसकी ताप आज लोगो के अंदर बसे रावण को भी जलाने की क्षमता रखता है या और भड़काएगी पता नहीं क्या। किन्तु पता नहीं क्यों आज रावण का जलना मनसुख को अच्छा नहीं लग रहा था। 
(विजयादशमी की आप सभी को हार्दिक शुभकामना )

Monday, 26 September 2016

टीवी और समाचार

                              
              बहुत दिनों बाद आज मनसुख खुश नजर आ रहा था। शाम को सब काम निपटाकर वही आँगन में एक  किनारे नीचे बैठा हुआ था।बगल में लालटेन की लौ गांव के किस्मत पर कब्जे जमाये काली रात को ललकारने में व्यस्त थी। सदैव के भांति मनसुख के चेहरे पर कुछ संतोष नजर आ रहा था। काका की नजर घर की देहरी पर बैठे-बैठे मनसुख की ओर गया।  काका मसुख को टोके बिना नहीं रह सके।
काका -का रे मनसुख का बात है बहुत चेहरा ख़िलल हौ आज।
मनसुख -है काका बाते कुछ अइसन है। लगता है काका तोहरे ध्यान वो  तरफ नहीं गया है। 
काका- का तरफ हम नहीं समझे
मनसुख -ऊपर देख काका कैसे झिलमिला रहा है।
काका ने नजर मनसुख के इशारे के दिशा में उठाया। देखा की आज काफी दिनों बाद कृशकाय विजली का खंभा जो बाढ़ की बदनीयत से आपने आपको अब तक बचाया हुआ था। उसके ऊपर मुकुट रूपी सुशोभित बल्ब कुपोषित बच्चे की तरह अपने जीवन से जैसे संघर्ष कर आज लौटा है लग रहा था। आश्चर्यजनक रूप से आज जैसे उस बिजली के तारो में आत्मा के प्रवेश को इंगित कर रहा था। गांव की सेहत को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता ,इसलिए लालटेन अपना दैनिक कर्तव्य निभा रही थी। फिर भी बिजली रानी बीच -बीच अपने आपको को निखार रही थी।  मनसुख और काका अपने-अपने कारण से मोहित लग रहे थे। 
                मनसुख के गांव में बीजली रानी कब कदम रखा ये तो ठीक-ठीक मनसुख को भी ज्ञात नहीं था। शायद देश के  विकास प्रवाह में मनसुख के गांव भी आया ,लेकिन वो प्रवाह निखरा नहीं और अभी तक अपने उसी रूप में है।  वह बचपन से ही वो खम्भे और उसपर लटका तार देख रहा था। लेकिन इस ससुराल में बिजली रानी जैसे खुश नहीं थी और जाने कब वो मायके भाग जाती। बड़े बाबू लोग कुछ जा कर मिन्नतें करते तो वो बीच बीच में वो झलक दिखलाने आ जाती थी। आज फिर से एक बार काफी दिनों के बाद वो अपने रूप का दर्शन गांव वालो को दी है और मनसुख उसे निहारने में व्यस्त है।  काका भी  उसके इस सम्मोहित रूप से नजर नहीं हटा सके। बिजली की स्थिति तो वही रहा लेकिन समय के प्रवाह ने घर में टीवी की उपस्थिति  को केबल के जंजालो  से अवश्य लपेट दिया। जिसके तार का एक कोना किसी तरह मनसुख भी अपने घर में  ले आया। बिजली की क्षमता का सभी को भान था इसलिए उसकी तंदुरस्ती के लिए मनसुख ने एक स्टेप्लाइजर भी ले रखा था। मनसुख के पास एक छोटी सी टीवी भी है। आज मनसुख खुश है की बहुत दिनों के बाद उसके पिटारे का ढक्कन खुलेगा।
                        मनसुख और काका खाने के बाद अपने एक कोठरी जो की बगल में था उसी में टीवी लगा था।  काका वैसे तो जल्दी सो जाते है लेकिन आज बहुत दिनों के बाद टीवी देखने का लोभ नहीं छोड़ पाए।
काका- लगा जल्दी चालू कर , बहुत दिन हो गलौ देखे बिना।
मनसुख -का देखे के है काका 
काका - का देखबौ समाचार लगा दे। 
               मनसुख ने एक समाचार चैनल लगाया तो उसके पर एंकर  के साथ साथ उपस्थित मेहमान भारत और पाकिस्तान के बिच युद्ध छेड़ बैठे थे। लगता था चैनलो से मिसाइल निकल कर सीधा पाकिस्तान पर ही गिरेगा। उनके चीखने चिल्लाने के तरीके से काका कुछ चिढ गए। और बोले ई का लगा दिया रे ई सब तो लग रहा है अपने में लड़ बैठेगा तो खाक पाकिस्तान से लड़ेगा। भगा एकराके। मनसुख  ने बटन दबाया। आगे खूबसूरत सी महिला एक समाचार चैनल पर अद्भुत ,अविश्वश्नीय,कुछ बाते बता रही थी। काका कुछ तुनके और कहा -अरे समाचार वाला चैनल नहीं है का। मनसुख -वही है काका। फिर ई का दिखा रहा है की ईसको बिजली का झटका नहीं लगता। यहवा अपने पोलवा के तार  पर लटका दे तब पता चल जायेगा की का होता है। चल कौनो और लगा। मनसुख बेचारा फिर से बटन टीपा। उसपर एंकर  बता रहे थे की इस जगह पर अश्व्थामा अभी भी आते है। नौ सो साल की गुथ्थिया सुलझाने में वह लगा हुआ था। काका चिढ से गए अरे इस सब कोनो समाचार है का। ई कहानी तो हमहू बचपन से सुनते आ रहे है। कही समाचार कुछ अपने देश प्रदेश के बारे में बता रहा है तो लगा। नहीं तो रहे दे। मनसुख बेचारा बदल -बदल कर देखता गया कहीं भारत भाग्य विधाता तो कहीं भारतवर्ष के नाम पर ऐतिहासिक समाचार पड़ोसे जा रहे है। अब काका से नहीं रहा गया बोले हम चलते  ई बोकवन के बकवास तुम्ही सुनो और देखो ,इससे अच्छा तो अपन रेडियो है। इहो बिजली आके बस नींदे ख़राब की है और काका सोने चल दिए। 
            मनसुख मन ही मन खुश हो गया। उसको अब तक जानकारी हो गया था की अब टीवी पर सास बहु की कहानी ही समाचार बन आता है। इसमें कुछो नहीं है है ,अब आराम से कोई फिल्म लगाते है और चैनल बदला उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा फिल्म नदिया के पार आ रहा था और "कौन दिशा में ले के चले रे बटोहिया गीत चल रहा था। मनसुख भी साथ ही साथ गुनगुनाने लगा और उसी में खो गया।  

Thursday, 22 September 2016

पछतावा

                       मनसुख के गांव में आज गर्वयुक्त उदासी बिखरी हुई है।  एक शहीद की अंत्येष्ठि में शामिल होना है।  बड़े -बड़े  कदम भर सभी उसी ओर चल पड़े जिधर हजारो कदम बहके बहके से चले जा रहे है। बहुत दिनों बाद ऐसा लग रहा है, देश और देशभक्ति की अनोखी बयार हवा में घुल गई है। सभी मन ही मन गौरवान्वित महसूस कर रहे है। हर कोई उस शहादत में अपना भी हिस्सा देख रहा है। तिरंगे में लिपटा शव पर फूल मर्यादित रूप से अपने आप को सहेज कर रखा हुआ है। इस मौके पर कोई भी पंखुरी अपने आपको उस तिरंगे से अंतिम विदाई देने के पूर्व विच्छेदन नहीं चाह रहा है। पीछे-पीछे सेना की टोली अनुशासित रूप से, कदम-से-कदम मिलाकर अपने साथी का साथ, महाप्रस्थान से पूर्व अंतिम कदम तक हौसला बनाये चल रहा है। क्या बूढा क्या जवान हर कोई इस पल को जीना चाह रहा है। आखिर देश के लिए उत्सर्ग कोई अपने आपको कर दिया है। नीले आसमान में चमक रहे सूरज भी लगा जैसे इन पलो में गमगीन हो अपने आपको बादलो में ढक लिया और दोनों हाथो से वृष्टि पुष्प उसके कदमो में बरसाने लगा। सारा गांव उस समय थम सा गया। पर्दे के लिहाज भूल महिलायें भी उस वीर जवान को एक झलक देख  अपने पलकों में बसा लेने हेतु उत्सुकता से अपने चहारदीवारी के किसी खाली झरोखे को ढूढने में प्रयत्नशील लग रही। सरकार के बड़े अधिकारी भी अपने इस मौके पर अपनी उपस्थिति सुनिश्चित कर रखे है। मनसुख भी उस भीड़ का हिस्सा है ,लखन चाचा भी साथ ही साथ चल रहे थे।
                   मनसुख भी  पीछे-पीछे चला जा रहा है।  किन्तु दृश्य उसके सामने पांच साल पहले का चलचित्र की भांति घूमने लगा। जब  लखन चाचा का बेटा अपने एक और साथी के साथ  बहुत खुश होकर आया और कहा की -बाबूजी हमारा फ़ौज में सलेक्शन हो गया और पत्र सामने रख दिया।मनसुख भी वही बैठा था।  तीनो हम उम्र मित्र थे। साथ साथ दोनों के चयन से बहुत खुश। किन्तु एक ही बेटा और फ़ौज की नौकरी अपने हाथो मरने मरने भेज दे। अंतरात्मा काँप गई थी। कहा- बेटा अपने पास काफी जमीन है खेती कर फ़ौज-वॉज में कुछ नहीं रखा है। मनसुख ने भी लखन चाचा से तरफदारी की किन्तु वो टस से मस  नहीं हुए।देश के प्रति मनसुख का लगाव कुछ कम हो ऐसा नहीं था ,किन्तु फ़ौज के लिए जो हौसला चाहिए वो नहीं था।  वो खेती कर खुश था और उसका दोस्त फ़ौज में ख़ुशी देख रहा था। कई बार मनाने पर भी नहीं माने। अंततः  मन  मसोसकर उसका दोस्त अपने बाबूजी की बात मान गया।  खेती को उन्नत विधि से करने के लिए लोन लिया। और सुखार ने सारे के सारे अरमान पर पानी फेर दिया। एक सुबह बेटे का शव घर के पीछे बगान में पेड़ से लटका पाया।सब कुछ ख़ामोशी से निपट गया। मनसुख उस वक्त भी  साथ था और अपने को गैर होते और दुःख पर कुटिलता के वाण अलग से चले ।
                   आज लखन चाचा के बेटे के  मित्र की विदाई है।अचानक तेज बिगुल की धुन सुनाई दी। मनसुख जैसे लगा नींद से जगा। अचानक तेज उठती लपटे लगा जैसे आसमान को भी अपने में समेटने को उधृत हो रहा हो। आसमान से रिमझीम फूलो का अर्पण चिता को सम्मानित कर रहा था। बगल में ही खड़े लखन काका को मनसुख ने देखा। नजरो में भुत गतिमान लग रहा था। आँखों के किनारे आंसू की बुँदे ढलकने को तत्पर लगा।मनसुख नहीं समझ पाया ये इस शहादत का दुःख या बीते कल का पछतावा।   

Sunday, 11 September 2016

अइलन बहार है ....

                         मनसुख को लगता है जैसे किसी ने झकझोर दिया। वह अकचकाकर इधर -उधर देखने लगा। किन्तु उसे दूर खेत की मेड ठीक करते बस काका दिखाई दिए जो बाढ़ से बर्बाद हुए खेतो को सुधारने में लगे थे। मनसुख हौले से अपने आप पर मुस्कुराया -अरे वाह  शायद वो सपना देख रहा था। उसने अपने राज्य में सुशासन के कई साल देख चुका था। तभी तो  मनसुख वहां टिक हुआ था अपने गांव में तो इसका तो अर्थ यही था की सुशासन जारी था नहीं तो मनसुख बाकी कलुआ और बौका की तरह कमाने दिल्ली बॉमबे नहीं भाग गया होता।       
                     खेत में काम करते-करते थक कर वही बगल में एक पेड़ के निचे सुस्ताने को बैठ गया की आँख लग गई। देखता है  बहुत बड़ा परिवर्तन लग रहा है। लोगो में असीम ख़ुशी दिखाई पर रही है। कितने वर्षो के बाद जनता का सेवक एकांतवास से दिव्यज्ञान की प्राप्ति के बाद लोगो का कल्याण हेतु चहारदीवारी को लांघ खुले आसमान में आज विचरण करने आये।मनसुख पता नहीं कैसे अपने-आपको उस भीड़ में घिरा पाया।  बाहर आते ही फूल मालाओ के साथ भक्तो की कतार और  महानुभाव ने दिव्य उद्घोषणा किया -परिस्थिति वश ऐसे भार बहुतो के ऊपर आ जाता है। सुशासन की जिस परिपाटी को इतने मुश्किल से खीचां है उसकी लकीर और गहरी करने में उनका योगदान का प्रयास अब होगा। उनके गुरु और नेता सर्वविदित है इसमें कहने की क्या जरुरत है। मनसुख को पता है की उसके गांव का भुवना किस गलती से आज तक जेल में है ये तो उसको भी पता नहीं है। लेकिन अभी भी है क्योंकि प्रसाशन बहुत सख्त हो रखा है ऐसा सभी कहते  है। किन्तु गांव के लोग तो उसके बारे भी बात-चित करने से कतराता है पता नहीं लोग क्या समझ बैठे। किन्तु मनसुख यहाँ का नजारा देख थोड़ा हतप्रभ है कि वाकई ऐसा भी होता है। मनसुख परिस्थितवस समझदार मूर्खो की भीर या भीड़ में शामिल समझदारो के बीच फर्क कर पाने में अपने-आपको असहज पा रहा था। 
                      मनसुख को न्यायपालिका पर बहुत विश्वास था। आज भी है ,किन्तु समझ नहीं पा रहा था की जो पढ़ा या बड़े बूढ़ों से जाना वो क्या गलत हो रहा था। उस भीड़ में मनसुख को कही काका नहीं नजर आ रहे थे ,नहीं तो काका के सर पर अपनी जिज्ञासा का भार लाद देता। आखिर जो सभी को दिख रहा था शायद कानून आखों पर पट्टी होने के कारण नहीं देख पाया। तभी तो अपना देश महान है। आखिर जनतंत्र है ये तो मनसुख को भी पता है और ये भी जानता है की जिसके पास जन है फिर तंत्र भी  तो वोही चलाएगा। मनसुख वैसे बहुत इतना सोचने को तत्पर नहीं रहता लेकिन उस स्वागत काफिले में खुद को को पाकर दिमाग में खयाल उछाल-कूद मचने लगा। कुछ दिन पहले तक मुह और नाक सूंघती उनके अधिकारी क्या ये नहीं सूंघ पा रहे थे की कि अब उनके किये धरे पर कोई बाल्टी में पानी भर तैयारी में लगा है। खैर इसमें वो क्या करते ,न्याय मूर्ति के रूप में स्थापित विद्य-गण की सेना न्याय की ही दुहाई दे, तो कौन किसके साथ न्याय कर रहा है और कौन अन्याय कहना मुश्किल। 
                      किन्तु नजारो से मनसुख मोहित था कितने गाडियो का काफिला उसकी यहिके से गिनती भी नहीं कर पाया ,पास आने की होड़ ऐसे की जो छू ले समझो उसको ही जन्नत मय्यस्सर हो गया। अब देखो की कैसे बहार आने वाला है अब तो लगता है की अपना ही दिन और अपना ही रात। देखे कब अब किन्तु तब तक मनसुख अपने आपको अपने गांव के छाँव में पड़ा पाया किन्तु कुछ बेवस सी आँखे उसे उस भीड़ अब भी जेहन में घूम रहा था। किन्तु काका को आते देख धीरे धीरे गुनगुनाने लगा -
अइलन  बहार है  भाई अइलन बहार है
कौन अब राजा यहाँ रोज तकरार है 
चलिहे फटका अब जाने कौन जहिये 
बीते कल के अब दिखे परिछाह है 
अइलन  बहार है  भाई अइलन बहार है.......     

Sunday, 28 August 2016

ककरा के घरे भड़े आयलहँ रे बदरवा....

                                         टिप -टिप बर्षा पानी , अगर आप कही सोच रहे कि  मनसुख कोई गीत नहीं गा रहा है तो ऐसा कुछ नहीं । वो तो बस अपने घर के  छप्पर से टपकते बर्षा के बूंदो को देखते हुए ऊंट की तरह गर्दन खिड़की से बहार कर  आसमान को निहारने की कोसिस में था। काफी समय के बाद आज बदरा रानी कुछ कम छमक रही थी ,नहीं तो कुछ दिनों से ऐसा लग रहा था की इंद्र के कोप से कही दुखी हो सारे के सारे बदरा कही धरती पर तो बसने के फ़िराक में तो  नहीं है। खैर मनसुख को ये समय कुछ गुनगुनाने का लग  रहा था। आखिर इसी लिए तो दुख और सुख  सभी के राग बने है। वैसे कोई वियोगी भाव मनसुख के मन पर हावी नहीं हो पाते और गीत उसके फितरत का भाग। बाकि वो मेघ-मल्हार है आ कोनो फ़िल्मी गीत उससे उसको कोनो मतलब नहीं है। 
                              सो  अब वो भी धीरे से बुदबुदाने लगा टिप टिप बरसा पानी पानी में आग लगाए। अब पानी में आग लगे न लगे मनसुख को पेट में भूख की आग के धुएं अवश्य उठने लगे थे। कल दोपहरिया में जो खाया अभी तक उसके बाद उसे कुछ नसीब नहीं हुआ। काका तो न जाने कबे विहाने उठ के बोरिया का बरसाती बना के छप-छप निकल गए कह कर कि आज कुछ राहत सामान बंटे वाला है सो लेके आते है।  
                                मनसुख के गांव की नियति है बाढ़ ,कोई पहली बार नहीं आया है ,सालो से वह अभ्यस्त है ,इन हालातो का। हर साल इस समय में नेता सब आते और वादा करते की अगले बरस अब इसका मुख मोड़ देंगे। किन्तु मनसुख काफी समझदार था ,आखिर गांव के सरकारी स्कुल से आठवी पास जो था।  मनसुख ऐसा नहीं है की हर बात को लेकर बस सरकार को कोसने लगे।अब सरकार के बस में तो नहीं है की वो बाढ़ को यह कहकर रोक दे की इसके लिए परमिशन नहीं लिए। लेकिन मनसुख को ये भी पता है की कई दफा उसके गांव में बाढ़ , रौदी (सूखा) के दिनों में भी सरकारी फाइलों में बहा है। जैसे बाढ़ खेतो के लिए उपजाऊ मिटटी लाती है सरकारी बाबुओ के लिए भी अपनी उर्वरकता को  सींचने का भरपूर मौका देती है। सो मनसुख खेत के बारे में सोच कर खुश था ,बाबुओ के विषय में सोचने के लिए तो सरकार है ही। किन्तु आज पेट की आग कुछ ज्यादा ही परेशान कर रहा था। करता भी क्या उसकी मेहरारू भी जो बच्चो के साथ मायके गई थी ,बाढ़ में फसी सो अभी तक लौटी नहीं। 
                           अब काका आये तभिये कुछ खाने पीने का बंदोबस्त हो। कल राते में सोते समय जब मेघ घुघुआ रहा था ,कोने में छप्पर कि छाती चीरकर एक धार कोने में गिरने लगा तो काका बोले -
मनसुखवा काले इस धार को मोड़ लेना ,नहीं तो पता चलेगा हम दोनों एकरे साथ तर गए।  मनसुख बोला -हाँ काका एक पुराना प्लास्टिक है कल बिहाने बांध देंगे। सो मनसुख सोचा अब जब तक काका नहीं आते तब तक ई काम निपटा ले। 
          ऐसे गांव में चहल-पहल कुछ बढ़ने लगा था।आखिर दो-तीन दिनों के बाद आसमान में कब्ज़ा जमाय कालिख कुछ -कुछ छटने लगा था। कुछ लोग गर्दन उठा -उठा कर सूर्य देवता को तरस भरी आँखों से ढूंढ रहा थे तो कोई अपने खेतो के समंदर रूप पर दुखी या खुश था चेहरे कुछ गवाही देने को तैयार नहीं था।कुछ तो बाकायदा खेतो और तालाबो के बीच बहती उलटी धार को देख मन ही मन खुश हो रहा था शायद आज माँछ -भात का भोग लग जाए।  
            मनसुख कोई मेघदूत तो नहीं पढ़ा था,लेकिन सुना अवश्य था।उसके मन में विचार उठा कि काश ये भागते मेघ हमारे मेहरारू को खबर कर देता कि -तुम्हारी याद सताती है , जिया  में आग लगाती है।किन्तु मेघ जाने कहाँ नजर फेरे सोचते ही विचार गर्म तवा पर भाप की तरह उड़ गया। और कहता भी कैसे  भागते मेघ ऐसे लग रहे थे जैसे उसने ओवर टाइम कर रखा हो और घर जाने की जल्दी में है। सो मनसुख के मन में उठे विचार उस तक शायद नहीं पहुच पाए।   पिछले साल से ये प्यासी धरती की सूखा के कारण कोई फसल नहीं हो पाया अबकी का इसको पानी से लबालब धरती की पानी से लहूलुहान धरती कहे -कुछ कुछ ख्याल मनसुख आते ही रहते है सो अब यही सोचने लगा।  खैर मनसुख को किसी से कोई शिकायत तो रहता नहीं सो वो काका के कहे अनुसार छप्पर पर बैठ कर अब प्लास्टिक को उससे ढकने में व्यस्त हो गया। 
           अब काम पूरा कर मनसुख अनमने सा नजर उठाया तो देखा क़ि काका कंधे पर बोरा में कुछ भरे बढे आ रहे है।  टिप-टिप बारिस तो चल ही रहा था किन्तु मनसुख काका को देखते जैसे फिर गुनगुनाने लगा और जल्दी -जल्दी छत पर से निचे उतरने को हुआ की काका ओहि से चिल्लाये -अरे मनसुखवा आराम से नीचे फिसलन हौ ,गिरले से बस   .... 
    खैर मनसुख अपने ही अंदाज में उतारकर निचे आया तब तक काका भी आँगन में पहुच गए और सामान से लदा बोरा कंधे से निचे रखने को हुआ कि मनसुख बोल पड़ा - ए काका भीतर आ जा अबीहो बारिस टिपिर -टिपिर है।  
तो ले भितरे रख न अब सब काका करतौ का -रोष भरे स्वर अपनापन को निहित कर रखा था। 
मनसुख चुपचाप सामान लेकर भीतर रखकर बोला -बड़ा देर लगा देले काका। 
न वहां तो मीना बाजार लगे रहे सो वोही देख रहे थे काका के चेहरे पर भूख की  कुछ तुनकी छा गई। 
न काका हमरे कहे के मतलब रहे की लगता है वोहाँ भीड़ बहुत रहे मनसुख बात बदल दिया। 
अब इतना दिन से देखते-देखते तो आज सामान बटले ,कोनो कीर्तन तो रहे नहीं कि लोग भगवान् के हजारी लगा के निकल जाय वहां प्रसाद रहे जब तक नहीं मिले लोग आवे कैसे । सो सब कोई आइले रहे। और अबे काल में अपन खद्दर वाला जकरा भोट दिए , न जाने हमारा सब के देखे आइल रहे की ई नजारा के देखे ,फोटो खिचबे में लगले रहे। के काका उ नेतवा-मनसुख बोला  
हाँ रे ओही ,रास्ते में जे गांव रहे वहां नेताजी हाल-चाल पूछे आयले रहे। तो ओकरे सुने में तनी रुके रहे। का बोले रहे थे मनसुख वाकिफ था फिर भी पूछा।  का बोलेगा ओहि सब जे चुनाव के समय में बोलत रहे। बोल रहे थे गंगा मैया दर्शन देवे घरे पर आई है। बाकी तो हर बार उ का कहत हाउ आयोग ओइसने कुछ और बनला से अब अगला साल से कोनो परेशानी ना होतौ ,से कहत रहे। 
मनसुख इन बातों से अब अभ्यस्त था सो काका की बातो पर ध्यान दिए बिना खोला की देखे किया-किया सरकार ने दिया है। बोरे में चुड़ा और चावल की पोटली बनी थी। 
ए काका ई का मिला है -मनसुख बोला 
जो तू देख रहा है वोही है और का। 
न काका हमर मतलब था की राहत के नाम पर बस इतना सा ही- मनसुख को कुछ खींझ हुआ। 
तो इतना का कम लग रहा है। वो तो बड़ा भलमानुस बाबु है की उतनो दे  देलौ। 
कुछौ कह लेकिन सब बड़ा ख़ुशी ख़ुशी सामान सब बाटत रहे। न तो ई बाबू सब आज कल कौनो काम करे चाहे है। 
लेकिन काका हमारा सब के परिवार के हिसाब से कितने मिले के रहे। 
अब हम उहाँ सामान ले की हिसाब-किताब करे -काका बोले उ बाबु और कहत रहे फेर कुछ दिन बाद सामान आएगा तो बाटेंगे।
मनसुख को सबके ख़ुशी-ख़ुशी सामान बाटने वाली बात से बस काका कि तरफ देखता रहा ,आखिर काका है भी उसी पीढ़ी के कि जो ऐसा सोच दिमाग में भी नहीं आते। किन्तु मनसुख दुनियादारी तो सिख चूका है और उसे समझते देर नहीं लगा कि वो ख़ुशी -ख़ुशी बांटे ऐसा भी कही होता है यहाँ ,हाँ वो बाँट-बाँट कर अवश्य खुश हो रहे होंगे कि ऐसे बारिश हर साल आये और इनके छीटे उसके भी ऊपर पड़ते रहे। 
किन्तु मनसुख कुछ न बोल बस काका से धीरे से कहा - काका जाओ अब पाव हाथ धोबे आओ जो है उसको ही भोग लगाते है। साथ ही साथ गुनगुना रहा था-        
                           ककरा के घरे भड़े आयलहँ रे बदरवा 
                         जोगीया  के वेश में अब घूमे है डकैतवा 
                         काहे नहीं जा का बसे वोहाँ पर ए बदरा 
                         सुख गइले जकराअंखिया में पानी के कतरा।।  
                          ककरा के घरे भड़े आयलहँ रे बदरवा।।  ......  .

Thursday, 25 August 2016

बच गेले तो जेल और ऊपर गइले तो चेक


मनसुख बहुत परेशान है ,समझ नहीं आ रहा ये का हो रहा है , भला ये भी कोई बात हुई ऐसे जिंदगी भी कोई जिंदगी है। का दे रही ई सरकार हमको। ऐसा कही होता है का।पहले तो खुद हि बाँट -बाँट के भोट लिया और अब ओहि पर  पहरेदार बिठा दिया।और कुछ सोचता   तब तक काका ने आवाज दिया -
का रे मंसुखवा वहां अकेले -अकेले किससे बतिया रहे हो।
केहुओ से न काका- मनसुख सकपकाया जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो।  न काका बस ऐसे ही सोच रहे थे ,धीरे से कहा।
ऐसे ही का रे ,मनसुख के आखो का दर्द काका पढ़ने कि कोशिस कर रहे थे।
बस काका हम तो ऐसे ही सोच रहे थे की अब आगे क्या होगा।
अरे आगे क्या होगा से क्या मतलब। जैसे हर बार होता आया वैसे ही होगा ,बाढ़ अइबे करेगा ,सूखा सुखइबे करेगी ,बचा-खुचा से जैसे चलता है चलबे करेगा और का।
न काका,उ सब तो हमहू समझते है। मतलब  काका हम कह रहे थे कि जैसे लगता है रौनक अब नहीं रहा अब लौटबो करेगा कि नहीं।
अरे मचन्ठा कौन रौनकबा की बात कर रहे हो। कहा गया की नहीं लौटेगा।
 न काका हमारे कहने का मतलब है की अब कोनो ख़ुशी -वुशी जब आबेगी तो उतना मजा नहीं आएगा।
कौन खुशिया आ रही रे तू तो बताया नहीं और कब आबे वाली है। काका की झुर्रिया पूछते ही चहक कर चेहरे पर छा गई।
ओहो ,न काका तुहु समझत नहीं हो ,हमार कहे के मतलब है कि शादी वियाह में जब तक उ ना हो न. तो मजा नहीं आबत है। अरे मंसुखवा ई का बोल रहा तू ,का फेर से फेरा के चक्कर में है का। काका अपनी त्योंरि को चढाने का असफल प्रयास कर रहे थे।
अरे नहीं काका तुम्हो न, का हम बोले- रहे दो अब। तुम्हार उम्रे  नहीं रहा तो हम का बोले चाह रहे है और तुम हो की का समझ रहे हो  काहे से समझोगे। रहे दो चलो खेते पे चले। न -न बोल न का तोहरे मन में चल रहा है-काका अब खुशामदी स्वर में  धीरे से मनसुख से बोले।
न काका हम कह रहे थे की अबकी बार जो होली-ओली आबेगी उसमे मजा नहीं आएगा। लगता है बिलकुल फीके -फीके ही जायेगा।
अब काका का दिमाग प्रशासन की सुस्त गति से चल कर  कुछ-कुछ समझने लगा था । लग रहा था जैसे-जैसे बात काका समझ रहे थे  दिल की टिस चहरे पर उठ रही थी। किन्तु फिर भी बोले -का रे अभिये फगुआ का कहा से आ गया।  तबहो काहे फीका होगा रे होली ,खूब जम के फगुआ और चैती गाबे जायेगा और होली के भोरे से बस छक के - किन्तु उसके आगे लगा जैसे काका को झटका लगा और चुप। यहाँ के दरोगा सस्पेंड हो गया कलही तो मनसुख बताया था।
किन्तु मनसुख को काका के गुजरे अनुभव पर कुछ भरोसा जगा और मनसुख थोड़ा चहक के पूछा कैसे छक के काका। मनसुख सोच रहा था जैसे काका को कोई जुगार लग गया हो। आखिर जुगार से यहाँ का नहीं होता और अब तक सारे काम तो जुगाड़े पर हुआ है चाहे इंदरा आवास हो या मनेरगा कि मजदूरी। जुगारपूर्ण देश में इस कला में  निपुण लोगो के लिए कुछ भी असंभव नहीं है और ये कोई विशेष बात तो नहीं।
तब तक काका खजूर पर लटके डाबा को देखकर बुदबुदाए -रहे दे मनसुख अब ऐसे हि फगुआ मनतौ,अब ओकरा से ध्यान हटा ले ,  बचेले से कुछो न मिले वाला है, बच गेले तो जेल और ऊपर गइले तो चेक।
मनसुख बुदबुदाया जैसे होली का जोगीरा गा रहा हो  -
वाह सरकार - वाह सरकार
चौक चौराहा द्वारे-द्वारे भठ्ठी सब खुलबा दियो
दिए जहर कि तुम्ही पुरिया अब इंजेक्शन लगबए रियो
वाह सरकार -वाह सरकार।।

मन की बात

फिर भी वो दांत निपोडे हँसता रहा...ही..ही..ही..। कल्ले में एक ओऱ दबाये पान मसाला के प्रोडक्ट को थूक संग समिश्रित करता, गर्दन को धीरे से घु...