Tuesday, 28 November 2017

मन की बात


फिर भी वो दांत निपोडे हँसता रहा...ही..ही..ही..।
कल्ले में एक ओऱ दबाये पान मसाला के प्रोडक्ट को थूक संग समिश्रित करता, गर्दन को धीरे से घुमा कर...आक थू....। उत्पाद के रस निचोड़ने के बाद त्याज्य पदार्थ उत्सर्जित कर दिया।
मनसुख को कदम पीछे हटना पर गया...।
उसके बत्तीसी अब भी सतरंगी छटा बिखेर रहा था। जिसपर कालाधन के साथ साथ अन्य रंगों ने कब्ज़ा जमा लिया है। अब भी यूँ ही दांत निपोडे हुआ है।
भैया आप तो बस हमें ही टोकते हो....का हो गया जो हम थोड़ी सी अपने मन की बात कह गए। सब तो अपने मन की बात कह रहे है...उन्हें तो कोई कुछ नहीं कहता। हमारे मन में तो बस इतनी बात है कि अब भावनाएं बहुत कम बच रही है सो काहे सब भावना से खेलते रहते है। और भौया सच कहूं तो कुछ काम धंधा रहे तब न ....अब खली बैठे है सो थोड़ा हम भी अपने मन की बात कर लेते है...थोड़ा टाइम पास हो जाता है...ही..ही...ही...। इस्टमेनकलर में दांत फिर से उसने दिखा दिया।
देखो बेकार की बातों का कोई मतलब तोड़े ही न है...। बात मतलब की करो न....।
उसने फिर केसरिया सुपारी के दो छोटे टुकड़े को जैसे अपना काम निकल जाने के बाद पार्टी साइड कर देती है,  बिलकुल उसी अंदाज में बाहर फेंक कर बोला-
यहाँ कौन मतलब की बात कर रहा है...। सब तो अपने ही मन की बात कर रहे है।तुम्ही बताओ भैया.....अब आलू से सोना निकलेगा इसमें का मतलब है ई का मन का बात नहीं हुआ।
अरे कहा कि बात कहाँ जोर रहे हो। मनसुख उसकी बातों को समझने की कोशिश कर रहा ।
अच्छा तो ई जो भंसाली साहब सेंसर बोर्ड से पहले "बुध्धु बॉक्स" के संपादक के पास पहुच गए ई का उनके मन का बात नहीं हुआ। हम तो पहले काहे थे की हमलोगों को पाहिले दिखा दो सो तो माना नहीं ।
लेकिन ये भी तो हो सकता है कि वो अपनी फिल्म के प्रोमोसन के लिए ई सब कर रहा है....।
तो का इससे हम सबका प्रमोसन नहीं हो रहा है...। हौले से मुस्कुराकर बोला । इस बार दांत पर होठो का बुरका लग गया।
   और भैया तुम नाहक काहे परेशान हो रहे हो । लोकतंत्र है....। जनता का जनता के द्वारा जनता के लिए किया जाना है। देखो ऊपर से नीचे तक सब अपनी मन की बात सुना रहे है। तुम भी सुना दो अपने मन की और क्या......ही...ही....ही....।
मनसुख उसकी थ्योरी को समझने के प्रयास में सर खुजाने लगा।

Thursday, 11 May 2017

सत्याग्रह ......

काका....
हाँ मनसुख बोल ......।
नहीं काका हम सोच रहे थे कि सब आजकल का हो रहा है अपने देश में। मनसुख सोचनीय मुद्रा में दिख रहा था।
काका- का रे ऐसा का नया हो गया जो पहले नहीं हो रहा था। हमको तो सब वइसने दिख रहा है। काका ने गाय को नाद के साथ लगे खूंटे से बांधते हुए पूछा।
मनसुख- नहीं काका सो तो ठीक है, लेकिन कुछो कुछो औरो हो रहा है जो तुमको या अभी नहीं पता है।
काका- तुम पहले ई सब गोबर को एक जगह जमाव , अपना काम पहले ठीक से कर.....काका इस तरह मनसुख को निठ्ठला बैठा देख झिड़कते हुए कहा।
   फिर थोड़ा रूककर पूछा..... तो बताओ न का हो रहा है।
मनसुख ने पहले तो अनसुना कर दिया शायद डांट का प्रभाव था। काका ने फिर लगभग पुचकारते हुए कहा... हाँ का बता रहा था रे .. ।
मनसुख ने थोड़ा नजर सीधा कर कहा- तुको पता है आजकल दिल्ली में सत्याग्रह चल रहा है
काका- का गंधजी फिर से जिंदा हो गए ...? काका के सफ़ेद मूंछ कुछ खिलने लगे।
मनसुख- अरे का सत्याग्रह खाली गंधजी ही कर सकते है...। मनसुख थोड़ी तेज आवाज में चिढ़ते हुए कहकर गोबर समेटने में लग गया।
काका- न हमतो ऐसे ही बोल दिए ,अच्छा छोडो बताओ कौन कर रहा है
मनसुख-  काका द्वापर में पांडव ने पांच गांव के लिए याचना किया था और कलयुग में पांच सवाल के जबाब के लिए सत्याग्रह किया जा रहा है। ये कहानी रामायण महाभारत मनसुख बचपन से ही काका के मुख से सुनता आया है।
काका- ई पांडव कौन है? आजकल होने लगे है कि...?
मनसुख -  आजकल देश बदल रहा है तुको नहीं पता? मनसुख ने प्रश्वाचक दृष्टि काका के ऊपर डाला काका अपने काम में व्यस्त। मनसुख बोलना जारी रखा - काका हम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओऱ जा रहे है। आजकल अपने यहाँ राम-रावण, कौरव-पांडव ,राष्ट्रद्रोहो-राष्ट्रभक्त में ही सब बट कर एक दूसरे को देख और तौल रहे है।
काका अभी तो एके पांडव दिख रहे है, बाकी लगता है अज्ञातवास पर है। मनसुख को लगा की उसका ध्यान अपने काम पर से भटक गया है सो चुप हो गया और गोबर के उपले बनाने में लग गया।
काका- तो ई धृतराष्ट्र कौन है जिनसे ई जवाव मांग रहे हैं।
मनसुख- जो हस्तिनापुर के सिंघासन पर बैठे है ।वही है। जो अपने आपको सत्यवादी हरिश्चंद्र कहते है।
काका- लेकिन ऐसा का कर दिया जो अब महाभारत होये के सम्भावना हो गया। काका ने सारे गाय को सब तक बाहर ला के बाँध दिया ।
मनसुख-महाभारत तो नहीं पता लेकिन सत्याग्रह तो जरूर हो रहा है।
काका- अब कोनो अंग्रेज है जो सत्याग्रह कर रहे है....किससे आजादी चाहिए इनको...?
मनसुख- काका सब ऐसे गडमड है कि हमुहो को नहीं समझ में आ रहा...।मनसुख के चेहरे पर विश्लेषक वाले भाव उभर गए। अब आजादी नहीं काका जवाव चाहिए जवाव । मनसुख कुछ तैस में लगा।
काका- देख बेटा ई बेकार के ड्रामा में इतना ध्यान न दे । ई सब एके हाउ। आज यहां फायदा तो इनके साथ न फ़ायदा तो बस एक नया कहानी ले के शुरू। जब शुरू से गुरु चेला बने घूम रहे थे तब नैतिकता नहीं कचोटे। आज गांधी के फोटो ले के बैठ गए है। हम तो पहले ही कहते थे कि ई सब इकठ्ठा हो के बस एक और सब्जबाग दिखा रहे है। तो तू को बड़ा जोश आता था न काका कुछ तो बदलेगा। देख का बदल गया। अरे बेटा चरित्र के जड़ में जब घुन लग गया तो पेड़ कुछ समय हरा भरा दिखेगा फिर तो सुखना ही है। सब समाज में हो रहे मूल्य को तो देखेंगे नहीं बस भेष बदल कर भाषणबाजी करेंगे। अरे ई सब भी इसी समाज से सिख के आये है। जो सीखे है वो कर रहे है। बाकी जनता तो नारे लगाने के लिए है ही....। आज इसके पक्ष में कल उसके पक्ष में ...।बदलना कुछ नहीं। देख नहीं रहे हमारी हालात जस के तस है। अरे कुछ बदलता तो हमहू नहीं बदलते और...... कहते कहते काका रुक गए।
मनसुख एक टक काका को सुन रहा था। अब तक उसने सोचा था कि काका को इन सब पर कोई झुकाव नहीं रहता। मन ही मन अब सोच रहा था काका की सब चीज पर पैनी नजर है...।


Thursday, 4 May 2017

गर्मी ....

काका माहौल बहुत गर्म है। मनसुख ने रात में आंधी और बारिश से भर गए पत्ते और कीचड़ को साफ़ करते करते कहा।
काहे रे रातिये तो बारिश हुआ है- हाथ में खैनी रगड़ते-रगड़ते काका ने पूछा। देखो कितना बढ़िया मौसम हो गया है। नहीं तो लग रहा था कि झुलसा  देगा और दो तीन थाप  रगड़ कर जोड़ से मारा।
 बस तुम रहने दो , हम कुछ और कह रहे है और तुम हो की यही पुरबिया और बरखा सोच रहे हो। मनसुख अपनी स्व्भविक वेग में बोला और कीचड़ को घर के सामने से हटाने में लग गया।
      अब तक काका का खैनी बन गया । चुटकी में उसे अंतिम रूप देकर उसे ऊपर के ओंठ में  भर लिया। गले से एक खखास कर थूक फेकते हुए मनसुख की ओर देखा।
        मनसुख तब तक आगे पीछे सफाई कर झाड़ू रखकर सामने चापाकल पर पैर हाथ धोने लगा। काका वही देहरी पर बैठ गए।
मनसुख - अब तुम रहने भी दो ।कुछ देश दुनिया का खबर रहे तब तो पता चले। मनसुख  अपने गमछे से मुह हाथ पोछता हुआ बोला।
काका- अब बेटा खोज खबर लेते भी रहते तो ऐसे ही रहते। दो जून रोटी का हिसाब रख लेते वही बहुत है।
इतने तो खोज खबर रखने वाले है। पर अपना स्थिति तो जस के तासँ है।
मनसुख- काका वो तो ठीक है पर का चल रहा है वो तो पता रखना है न। नहीं तो आगे भी वैसे ही चलते रहेगा। लगभग काका की बातों में सहमति की मुद्रा दिखाते हुए मनसुख बोला।
काका- खैर बता का कह रहा था कि गर्मी बहुत बद्ग गई है। कौन से गर्मी की बात कर रहा है। अब काका भी मनसुख की बात से सहमत दिख रहे।
मनसुख- फिर से वही सीमा पर अंदर घुस के अपने जवान पर हमला कर के मार दिए। पाकिस्तानी कभियो सुधरेगा नहीं। बहुत तनाव है।
काका - तो अपने सैनिक का कर रहे थे। वो कहे  नहीं वही पर टेंटुआ दबा दिए।
मनसुख- अब ई तो नहीं पता। शायद सरकार का आदेश नहीं होगा। मनसुख कुछ दुखी भाव से बोला।
काका- तो का सरकार खाली मरे के आदेश दिया है। काका की झुर्रियों में कुछ खिंचाव आ गया।
मनसुख- काले रेडियो में समाचार दे रहा था कि सरकार ने इसका घोर निंदा किया है।
काका- निंदा करे से का ओकरे नींद उड़ जाएगा । समाचार तो ऐसे ही सुना रहे हो। निंदा तो ओहो खूब किये रहे लेकिन तनिक मौन रहकर। काका के मुह पर उलाहना के भाव घिर गए। ई तो खूब मुखर है तो भी निन्दा और बयाने से काम चला रहे है।
मनसुख - न काका ऐसा नहीं है देखा नहीं पिछले दफा कैसे घुस के मारे थे । मनसुख के चेहरे पर कुछ गर्व के भाव भर आये।
काका- हाँ बस यही सब के सुना सुना के पेट भर दे। अरे तितर वा के संग बटेर बनला से काम चलेगा। बेचारे जो जा रहे है उनका घरे से पूछो। सब बातें के गोली चलावे में लागल है। अब जाओ और केक खा के आओ।
मनसुख- काका कोनो काम करे तो तुम खोट निकालन में ही लगे रहते हो।
काका- बेटा हम खाली भगवान् के भक्त है।
मनसुख- तू को अभी समझने में देर है। देख काका इसको डिप्लोमेसी कहते है। मुस्कुरा के मनसुख बोला।
काका- देख चार आखर पढ़के तू जो चाहे बोल लेकिन बेटा घर में बुलाके जांच करवाया का हमारे अधिकारी सब गुड़ गोबर है...। काका की त्योरियां चढ़ी जा रही थी।। जब मन हो जा के केक खा ले और जहाँ मन हो जा के गरिया दे । ऐसा नहीं होता है। कहते -कहते काका रुक गये।
मनसुख - तो काका का करि के चाही ??
काका,- अब ई तो काबिल लोग सब बताएगा ....देख नहीं रहा कल टिबिया में कैसे चिल्ला चिल्ला के पाकिस्तान को हरा दिया। बेटा ई पाकिस्तानियों भी सब जानता है ।आखिर दोनों सहोदरे हो न ....
इतना कहते कहते  काका की आँखे जाने कहाँ खो गया और मनसुख टुकुर टुकुर ताकने लगा।

Friday, 14 April 2017

एक आश .....।


हे मानवाधिकार के ज्ञाता
हे इस धरा के क़ानूनी आ-भूषण के सिरमौर
देखो मौका है .....उठो.....आँखे खोलो....कब से हम....इन्तजार में है......अपने शक्ति को पहचानो....उसे पाकिस्तान नहीं.....अखंड भारत का एक हिस्सा मानो...... देखो अपने ज्ञान और विवेक पर कालिख न लगने दो......बस अब कूच कर जाओ......है इन्तजार वहां भी....कोई तो आये और गुहार लगाएं..... देखो ....हम कब से इन्तजार में है.....किसी कुल का भूषण.....खोने वाला है....
         हे भारत के  न्यायमूर्ति..... मानवाधिकार के भूषण .......अब शांत नहीं....."प्रशांत" महासागर सा उसे अपनी ज्ञान गंगा से पुनः इसी धरा पे ले आओ।
        हम जानते है तुम्हे तो सिर्फ निरीह मेमना की वेदना से व्यथित थे.......। तुम तो सिर्फ न्यायप्रिय हो हमें पता है....।
          हे बेसुरे अज्ञान के ज्ञानी जन........ हमेशा झकझोरते इस धरा का मन........। कहाँ किस कुञ्ज गली में खो गए.......। अब आ भी जाओ .....। उन गलियो में भी अपनी तान सुना जाओ.......। जहाँ किसी कुल का भूषण खोया है......।
       जाओ  वत्स .....चिंतातुर न होओ..... आज इस बात को साबित कर दो.....असाब खटमल से तुम्हारा कोई नाता नहीं था.....तुम तो बस आजादी प्रिय हो......। और हाँ.... अपने साथ जवा..... हर......लाल ....को भी ले लेना....कोई अपनी आजादी के लिए तुम्हारा राह देख रहा है...।
        लोग राह देख रहे है........। उन गलियो में अपने आभूषणों को न्योछावर करने का........। हे प्रबुद्धजन गण कहाँ ले जाओगे.......। ये तख्तो और ताज......। देखो .....जाओ बिखेर दो उन गलियो में .......वो पुरस्कार और सम्मान.......। जो गले को चीखने से रोकता है.......।
  अब फिर से समय आया है.......। साबित कर दे ....हे गुनी...जन.... मन.....इस स्वतंत्र धरा के गन .....। साबित कर दो पहले कुछ भी दिखावा नहीं था....। आप वाकई इंसानियत के सच्चे हमदर्द है.....।
       खोये हुए किसी कुल के भूषण को पाने में मददगार बने....। इसी आस में....।।
         मनसुख जाने किस्से सपने में गुहार लगा रहा है....।।

Saturday, 8 April 2017

फ़िल्मी अवार्ड

       
       किसी से भैया कुछ न पूछो ।अब हर चिज में मीन मेख  ठीक तो नहीं। लो देखो कैसे सब इस अवार्ड के धकियाये रहे है। अब सबके एक पसंद थोड़े सो सके। जकरा जे पसंद आवे , दे दिहिस।अब हर बाते के एक रंग से देखना ठीक नहीं।
       अब रुस्तम के बीबी जो भी किये उसमे रुस्तम के का गलती रहे। वो तो अपने काम ठीके किये थे सो अवार्ड मिल गयो। अब एही में देशी और विदेशी कहाँ से आ गया। लेकिन कुछो तो उ का बोले है जूरी ऊ के सोचे चाही।अब भैया समय ऐसे ही ख़राब है सो दो दो बेटियों को पाले में का हाल होबे है सो जा के उनका पूछो। और उतने नहीं बेटियस सबके यु मिटिया में लोटाय लोटाय के दंगल करवाना कोनो आसान काम थोड़े रहे।  देखो कैसे दुनु बिहनिया के पहलवान बनाय दिस। लेकिन जो भयो ठीक नहीं है कहा  "बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ " के नारा सब जगह भांय भांय सुनाई देत है।लेकिन जब एक बेचारा बाप उतनी मुश्किल से अपन बेटी को बनावत हो तो कोई इनाम नहीं।भैया कुछो तो बाप के दर्द समझो। लेकिन समझे कैसे बेटी के बाप होये तब तो। अब जाओ भैया अवार्ड तो चले गवे कही और। सुन्दर मेहरारू के देख सब भैया ओकरे पसंद केलिस तो अब का कहे।अब कितनो सुल्तान सुल्तान चिल्लाय लियो ई रुकबे नहीं। कहा सुल्तान के मेहरारू और कहा रुस्तम के। ले गयो भैया अब गावो खूब अशहिष्णु राग, गला भोथरा जाहिये लेकिन अवार्ड वाला सुर न पइबे। लेकिन कुछो कहो बिटिया नीरजा तो नाम रौशन करे दिहिस। एहि में कोनो दिक्कत होवे के न चाही। 
       अब एके ठो के लेके अइसन बात ठीक नहीं। बाकी ऐसे भी कलाकर कोनो अवार्ड के भूखे थोड़े रहिस। उनका तो कला के सम्मान चाही दर्शको के प्यार चाहिस और का। लेकिन भैया जे कहो रुस्तम कोनो ठीक किये रहिस का ? बीबी तो सुल्तान के ठिक रहिस। बाकी जूरी जाने हमको का पता।
    तब तक काका जोर से आवाज दिए-अरे मंसुखवा बेरिया बीते जा रहा है ,चारा देवेगा की ऐसे घोड़ा बेचकर सोये रहेगा। मनसुख पता नहीं किससे सपने में भाषण बाजी कर रहा था।
      

Wednesday, 29 March 2017

मनसुख और एंटी रोमियो

काका परेशान सा मनसुख को ढूंढ रहे है।पीछे खलिहान और दालान सबी जगह देख लिया लेकिन मनसुख है कि दिख नहीं रहा।
काका ने आवाज लगाया - मंसुखवा अरे मंसुखवा कहाँ मर गया रे। काका जब नाराज होते है तो ये उनका आशीर्वाद होता है मनसुख के लिए। कोई आवाज न सुनकर वही पिछवारे में छाही में बैठ गए।
तभी थोड़ी देर में मनसुख वहीँ खेत की तरफ से लोटा हाथ में लिए हुए आते दिखा। दिन के आठ बज गए थे। शौंच आदि से निवृत होने का यह बहुत ही विलम्ब समय है। मनसुख को देखते ही काका की त्योरियां चढ़ गई। का रे तोहरो अब नया जमाना के हवा लग गया है कि। ई कौन सा समय है दिशा जाने का। मनसुख काका के इस रूप को देख थोड़ा सकपका गयालेकिन सँभालते हुए बोला- न काका अब तो शौचालय बनने वाला ही है सो कभियो जा सकते है ओही का अभ्यास कर रहे है और मुस्कुराने लगा।
काका-तोहरा अभी दिल्लगी सूझ रहा है। ई देख का आया है। काका ने हाथ में रखे लिफाफे को हिलाते हुए दिखाया। मनसुख अपने हाथ में रखे लोटा को राख से मांजते-मांजते पूछा। का है काका ई।
हम जो पढ़े होते तो तुमरे बाट निहारते खुदे नहीं पढ़ लेते। हमको का पता की इसमें का लिखा है।थोड़ा चिढ़ते हुए कहा।लेकिन वो डाकिया बाबू कह रहे थे की लखनऊ से आया है। शायद तोहरे साडू का है। अब तक मनसुख हाथ पेड धो चूका था।गमछे से हाथ मुह पोछते बोला कही उनकी बिटिया का ब्याह का न्योता तो नहीं है। काका-अब तू खुदे देख ले बोलकर लिफाफा मनसुख की ओर बढ़ा दिया।
मनसुख लिफाफा खोलकर पढ़ते पढ़ते थोड़ा गंभीर सा हो गया। काका-का रे सब कुछ ठीक है न।
मनसुख- हा काका गुड्डी का ब्याह है।
काका- ई तो बड़ा ख़ुशी के खबर है,लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे तू को ख़ुशी नहीं हुआ।
मनसुख-न काका अइसन कोनो बात नहीं है। हम सबको ब्याह में बुलाया है।
काका-वो तो बुलाइबे करेगा कब है ब्याह।
मनसुख- अगले हफ्ताह चार तारीख के।
काका-तब तो अभी समय है चल जा टिकेट कटा ला।
मनसुख- अभिये टिकेट काहे काका हम जाई काल में कटा लेंगे।
काका- अरे ई कोण बात हुआ मेहरारू भी जायेगी अइसन कैसे चल जाएगा।
मनसुख- न काका हम सोच रहे थे की अकेले चले जाए।
काका- तोरा दिमाग सठिया गया है कि। मेहरारू को छोड़ के जाएगा।सब का बोलेंगे। चल बचवन सब तो हमरे साथ रह लेंगे। हमरो मन लगा रहेगा।
मनसुख- न काका वो सब तो ठीक है लेकिन मेहरारू के साथ में लखनऊ जाये में थोड़ा डर लग रहा है।मनसुख कुछ झिझकते हुए बोला। तुम समाचार वामाचार पढोगे तब तो पता चलेगा।
काका-अरे कोनो तुम भाग के शादी कयो है कि जो तुमको डर लग रहा है। काहे का आता है समाचार में।
मनसुख- न काका वो योगी जी एंटी रोमियो स्क्वाड बना दिए है न, कही हम दोनों को साथे देख पुलिस वाला रोमियो समझ के बंद कर दे तो।
काका बड़े ध्यान से सुन रहे थे लेकिन उनके पल्ले कुछ पर नहीं रहा था।अब तक सूरज भी थोड़ा ऊपर चढ़ गया था। गमछे से पसीना पोछते बोले- ई रोमियो का होता है रे। मनसुख को समझ नहीं आ रहा था कि इसका क्या जवाब दे ,नजर नीचे करके बोला- ई जो लड़का सब लड़की को प्यार करता है उसको काका रोमियो कहते है। तो इसमें शरमाये वाला कौन सा बात है जो तू ऐसे नजर झुका लिया है, लगता है मेहरारू के संगत में तू भी मेहरारू बन गया है। मनसुख को काका का ये कटाक्ष बढ़िया नहीं लगा और तुरंत बोला-न काका अइसन कोनो बात नहीं है, लेकिन अगर हमको साथे देख के पुलिस वाला कुछो सबूत मांग बैठेगा तो हम का दिखाएंगे।
काका- लेकिन ई योगीजी रोमियो के पीछे काहे पर गए है। माना खुद ब्रह्मचारी है लेकिन जिसको प्यार व्यार हो गया है उसके पीछे काहे पर गए है। ई तो बढ़िया बात है न की सब एक दूसरे से प्यार करे।
मनसुख- काका प्यार तो ठीक है लेकिन उनका कहना है कि ये खुल्लम खुल्ला रोमांस ठीक नहीं है। काका के लिए रोमांस नया शब्द था चौंक कर हौले से पूछा- ऐ मनसुख ई रोमांस का होता है। चेहरे पर काका के कुछ रौनक सा छा गया। काका तुम हमेसा ई फालतू बात न करो, हमको न पता ई रोमांस के बारे में, वैसे तुम सब जानत हो बेकार में हमसे ठिठोली कर रहे हो।
मनसुख की इस बातो से काका कुछ गदगद हो गए और कहा- अरे लेकिन तू को कहे डर लग रहा है। तो मनसुख बोला-काका काले पेपर में दिया था कि एक मिया बीबी पार्क में बैठे थे उसको पुलिस ने रोमियो समझ के बंद कर दिया।
काका- अरे ई रोमियो का बहुते ख़राब आदमी था कि, अइसन का किया था तुम जानते हो।
अब काका की इन बातों से मनसुख को अपने ज्ञान बघारने का मौका मिल गया।आखिर वो भी सरकारी स्कूल से दसवीं पास था।
मनसुख- न काका रोमियो तो बड़ा भला लड़का था और उसकी जूलियट को बड़ा प्यार करता था। इसलिए प्यार करने वाले लड़के सबको रामियो कहते है।इसके आगे अब उसे और कुछ याद नहीं आ रहा था।
काका- बड़ा अजीब समय आ गया है।आजकल कोई एक दूसरे से प्यार नहीं करना चाहता, जहाँ देखो सब एक दूसरे को त्योरियां चढ़ा कर ही देखते है, फिर ये भोले भाले मासूम जिनको प्यार करने की उम्र है अगर इसको इस जुर्म में हवालात में बंद करोगे तो नफरते फैलेगी। मनसुख ध्यान से काका के बात को सुन रहा था और बोला इसलिए तो काका हम जाना नहीं चाहते।
काका- अरे ई सब अइसने कुछ पुलिस वाला के जबरदस्ती है।आजकल तो कोई काम नहीं करना चाहेगा और करबो करेगा तो अर्थ में अनर्थ लगा देगा। अरे योगीजी कुछ और कहे होंगे और ई सब कुछ और समझ बैठा है। तू चिंता मत कर अइसन अंधेर अभी नहीं है कि तू को मेहरारू के साथ देखके रोमियो समझ लेगा। तू अइसन तो कबुहो नहीं लगता है, जा अपना टिकट कटा ले।
मनसुख समझ नहीं पाया कि काका उसकी तारीफ कर रहे है कि ताना मार रहे है।लेकिन जबाब में गर्दन हिलाते उठके गुनगुनाते चल दिया।काका हौले हौले मुस्कुरा रहे थे।


Monday, 20 March 2017

जोगीजी वाह ......

आज मनसुख के चेहरे पर मोती की तरह झलकता पसीना जैसे नाच रहा है। चारा काटने वाले मशीन को दे जोर जोर से घुमाते हुए अपने ही धुन में गुनगुना रहा है-
          योगी जी धीरे धीरे ,  ले लिये सी ऍम के फेरे
          योगीजी वाह योगी जी वाह....।।
काका वही बगल में अपना पुआल ओटियाने में लगे थे। मनसुख के हाव भाव को बहुत देर से देख रहे थे। का रे मंसुखवा का बात है ।अब तो होलियों ख़तम हो गया और अब तक फगुनी गाये जा रहे हो। काका के आवाज से लगा जैसे मनसुख के तल्लीनता में ब्रेक लग गया। मनसुख काटे हुए चारा को एक तरफ रखते हुए बोला- काका तुमको न दिन दुनिया का पहले पता था न अब रहता है।
काका- का रे अइसन का हो गया जो हमको नहीं पता है।
मनसुख- तुमको पता है योगीजी अब मुख्यमंत्री बन गए।
काका-  काहे नितीश कहा चले गए और शुशील मोदी कब योगी हो गए। चल तब कही से तारी ला बहुते दिन ससुरा बंद कर दिए।
मनसुख- काका तुम बस तरिये के चक्कर में रहो और हम अपने शुशील मोदी नहीं यू पी के योगी के बात कर रहे है।
काका- न रे हम भी नरेंद्र मोदीये सोच रहे थे का उ अब योगी बन गया। लेकिन कुछो है पुरे हिलाय दिया है। लेकिन उ योगी कब बन गया।
मनसुख ने अपना सर झटक कर अब इकठ्ठे घास को टोकरी में रखने लगा। काका फिर बोले-अरे बताओ तो।
मनसुख- तू को नहीं पता तो पूछो न का अंट शंट हिसाब लगा के बोल देते हो। हम यू पी के नये मुख्यमंत्री के बात कर रहे है। अब वहाँ के मुख्यमंत्री योगीजी हो गए है।
काका- अरे ई नाम के कोनो योगी है कि सचमुच के योगी है और योगी है तो मुख्यमंत्री कैसे बन गया। जाओ कही धुनि रामओ, भगवान का भजन गाओ।ई जोगी सबके अब का हो गया है।
मनसुख- काका ई योगिये है और सब कह रहे है कि ये उत्तम प्रदेश बना देगा। यू पी के हिला के रख देगा।
काका कुछ सोचने की मुद्रा में अपने सफ़ेद दाड़ी खुजलाने लगे और बोले- वैसे तो हमको ज्यादा नहीं पता, लेकिन अब तक धनबली, बाहुबली बाले नेता तो सुने थे लेकिन ई योगबली बाले नेतवन सब भी बहुत हो गए है। आखिर कुछ तो बदल रहा है। और ऐसा तो नहीं की हिलाय के चक्कर एक दूँ ठो खूटवा उखड़ जाए।
इस पर मनसुख भी कुछ सोचनीय मुद्रा में आ गया और
चारा मिलाकर गाय को देते हुए बोला हाँ काका कुछ तो बदल रहा है लेकिन का समझे में नहीं आ रहा है। बाकि तो वकते बताएगा कि खूंटा हिलेगा की मजबूत होगा।
काका- सुन बुड़बक अब तू ई चारा/वारा छोड़ और देख उ मंदिर के महंत है न उससे कुछ दीक्षा ले ले।
कहे काका मनसुख कुछ समझ नहीं पाया।
काका-। तू बुड़बक ही रहेगा।अरे का पता भगवान् के आरती करते करते कब भगवान् प्रसंन्न हो जाए।अपने यहाँ भी तुझे टिकट मिल जाए।अरे अभी तो पांच साल है।अब कुछ सोच ले।
मनसुख बिना कुछ बोले गुनगुना रहा था- योगीजी वाह योगीजी
कोई मांगे कुर्सी कोई मांगे टिकट
हम मांगे दो जून की रोटियां बस
योगीजी वाह योगीजी।।


Tuesday, 24 January 2017

पूर्ववत

                         साईकिल ने हाथ थमा या हाथ ने साइकिल ये तो पता नहीं। लेकिन दोनों को सफर में एक दूसरे की जरुरत है सफर तय करने के लिये। वो निकल पड़े है मंजिल के लिए ।पीछे पीछे कुछ लोग दौर रहे है। उनकी शिकायत है कि साईकिल तो उनकी जागीर है इन्होंने धक्का मारकर गिड़ा दिया । अब किसी और को पीछे बिठाकर खीच रहे है। जमीन जायदाद ले लेते हम कुछ न कहते किन्तु ये एक मात्र सहारा साईकिल छीन कर भाग रहे ये तो ठीक नही।एक बेचारा बुजुर्ग रास्ते के किनारे खड़ा खड़ा हांफ रहा है। घोर कलियुग है जिसने साईकिल ताहफे में दिया उसी को बिठाने से मना कर दिया।
                किन्तु रास्ते पर चलते-चलते अगर बीच रास्ते में हाथी मिल जाए तो लड़खड़ाना स्वभाविक है। और ये तब तो बिलकुल संभव है जब साईकिल को किसी कमजोर हाथ ने थाम लिया हो ।हाथी मस्त है और मंजिल के लिए निकल भी पड़ा है । साईकिल सवार बिना छेड़े साइड से मंजिल पहुचने की जुगत में है।किंतु जाने कहाँ से कुछ चींटी हाथो के सूंड में काटा ।हाथी भड़क गया चिंघाड़ सुनकर साईकिल लड़खड़ा कर रास्ते के किनारे कीचड़ संग नाले में गिरता है जिसमे कुछ कमल खिल रखे है। हाथी गुस्से में नीचे कीचड़ में घुस आता है किंतु सामने साईकिल सवार ,साईकिल तोड़े या कमल कुछ परेशान सा लग रहा है। बेचारा कमल पूरी तरह से खिल भी नहीं पा रहा है ।जाने कौन किसका शिकार बने ।अब तो मनसुख के मन में ये सब देखकर बस यही कुलबुला रहा है कि अब भले कोई साईकिल पर चढ़ा ले या हाथी पर बैठाये ,सुन्दर खिले कमल से मन बहला दे कल '':::'''''पता नहीं क्या ''''
                        कौन खिलेगा कौन टूटेगा या हाथी चिंघारेगा या तो वक्त ही बताएगा , मनसुख बस वक्त काटने में लगा है ...पूर्ववत सा.....।।

मन की बात

फिर भी वो दांत निपोडे हँसता रहा...ही..ही..ही..। कल्ले में एक ओऱ दबाये पान मसाला के प्रोडक्ट को थूक संग समिश्रित करता, गर्दन को धीरे से घु...