Tuesday, 24 January 2017

पूर्ववत

                         साईकिल ने हाथ थमा या हाथ ने साइकिल ये तो पता नहीं। लेकिन दोनों को सफर में एक दूसरे की जरुरत है सफर तय करने के लिये। वो निकल पड़े है मंजिल के लिए ।पीछे पीछे कुछ लोग दौर रहे है। उनकी शिकायत है कि साईकिल तो उनकी जागीर है इन्होंने धक्का मारकर गिड़ा दिया । अब किसी और को पीछे बिठाकर खीच रहे है। जमीन जायदाद ले लेते हम कुछ न कहते किन्तु ये एक मात्र सहारा साईकिल छीन कर भाग रहे ये तो ठीक नही।एक बेचारा बुजुर्ग रास्ते के किनारे खड़ा खड़ा हांफ रहा है। घोर कलियुग है जिसने साईकिल ताहफे में दिया उसी को बिठाने से मना कर दिया।
                किन्तु रास्ते पर चलते-चलते अगर बीच रास्ते में हाथी मिल जाए तो लड़खड़ाना स्वभाविक है। और ये तब तो बिलकुल संभव है जब साईकिल को किसी कमजोर हाथ ने थाम लिया हो ।हाथी मस्त है और मंजिल के लिए निकल भी पड़ा है । साईकिल सवार बिना छेड़े साइड से मंजिल पहुचने की जुगत में है।किंतु जाने कहाँ से कुछ चींटी हाथो के सूंड में काटा ।हाथी भड़क गया चिंघाड़ सुनकर साईकिल लड़खड़ा कर रास्ते के किनारे कीचड़ संग नाले में गिरता है जिसमे कुछ कमल खिल रखे है। हाथी गुस्से में नीचे कीचड़ में घुस आता है किंतु सामने साईकिल सवार ,साईकिल तोड़े या कमल कुछ परेशान सा लग रहा है। बेचारा कमल पूरी तरह से खिल भी नहीं पा रहा है ।जाने कौन किसका शिकार बने ।अब तो मनसुख के मन में ये सब देखकर बस यही कुलबुला रहा है कि अब भले कोई साईकिल पर चढ़ा ले या हाथी पर बैठाये ,सुन्दर खिले कमल से मन बहला दे कल '':::'''''पता नहीं क्या ''''
                        कौन खिलेगा कौन टूटेगा या हाथी चिंघारेगा या तो वक्त ही बताएगा , मनसुख बस वक्त काटने में लगा है ...पूर्ववत सा.....।।

सत्याग्रह ......

काका.... हाँ मनसुख बोल ......। नहीं काका हम सोच रहे थे कि सब आजकल का हो रहा है अपने देश में। मनसुख सोचनीय मुद्रा में दिख रहा था। काका- क...