Friday, 14 April 2017

एक आश .....।


हे मानवाधिकार के ज्ञाता
हे इस धरा के क़ानूनी आ-भूषण के सिरमौर
देखो मौका है .....उठो.....आँखे खोलो....कब से हम....इन्तजार में है......अपने शक्ति को पहचानो....उसे पाकिस्तान नहीं.....अखंड भारत का एक हिस्सा मानो...... देखो अपने ज्ञान और विवेक पर कालिख न लगने दो......बस अब कूच कर जाओ......है इन्तजार वहां भी....कोई तो आये और गुहार लगाएं..... देखो ....हम कब से इन्तजार में है.....किसी कुल का भूषण.....खोने वाला है....
         हे भारत के  न्यायमूर्ति..... मानवाधिकार के भूषण .......अब शांत नहीं....."प्रशांत" महासागर सा उसे अपनी ज्ञान गंगा से पुनः इसी धरा पे ले आओ।
        हम जानते है तुम्हे तो सिर्फ निरीह मेमना की वेदना से व्यथित थे.......। तुम तो सिर्फ न्यायप्रिय हो हमें पता है....।
          हे बेसुरे अज्ञान के ज्ञानी जन........ हमेशा झकझोरते इस धरा का मन........। कहाँ किस कुञ्ज गली में खो गए.......। अब आ भी जाओ .....। उन गलियो में भी अपनी तान सुना जाओ.......। जहाँ किसी कुल का भूषण खोया है......।
       जाओ  वत्स .....चिंतातुर न होओ..... आज इस बात को साबित कर दो.....असाब खटमल से तुम्हारा कोई नाता नहीं था.....तुम तो बस आजादी प्रिय हो......। और हाँ.... अपने साथ जवा..... हर......लाल ....को भी ले लेना....कोई अपनी आजादी के लिए तुम्हारा राह देख रहा है...।
        लोग राह देख रहे है........। उन गलियो में अपने आभूषणों को न्योछावर करने का........। हे प्रबुद्धजन गण कहाँ ले जाओगे.......। ये तख्तो और ताज......। देखो .....जाओ बिखेर दो उन गलियो में .......वो पुरस्कार और सम्मान.......। जो गले को चीखने से रोकता है.......।
  अब फिर से समय आया है.......। साबित कर दे ....हे गुनी...जन.... मन.....इस स्वतंत्र धरा के गन .....। साबित कर दो पहले कुछ भी दिखावा नहीं था....। आप वाकई इंसानियत के सच्चे हमदर्द है.....।
       खोये हुए किसी कुल के भूषण को पाने में मददगार बने....। इसी आस में....।।
         मनसुख जाने किस्से सपने में गुहार लगा रहा है....।।

मन की बात

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