Thursday, 4 May 2017

गर्मी ....

काका माहौल बहुत गर्म है। मनसुख ने रात में आंधी और बारिश से भर गए पत्ते और कीचड़ को साफ़ करते करते कहा।
काहे रे रातिये तो बारिश हुआ है- हाथ में खैनी रगड़ते-रगड़ते काका ने पूछा। देखो कितना बढ़िया मौसम हो गया है। नहीं तो लग रहा था कि झुलसा  देगा और दो तीन थाप  रगड़ कर जोड़ से मारा।
 बस तुम रहने दो , हम कुछ और कह रहे है और तुम हो की यही पुरबिया और बरखा सोच रहे हो। मनसुख अपनी स्व्भविक वेग में बोला और कीचड़ को घर के सामने से हटाने में लग गया।
      अब तक काका का खैनी बन गया । चुटकी में उसे अंतिम रूप देकर उसे ऊपर के ओंठ में  भर लिया। गले से एक खखास कर थूक फेकते हुए मनसुख की ओर देखा।
        मनसुख तब तक आगे पीछे सफाई कर झाड़ू रखकर सामने चापाकल पर पैर हाथ धोने लगा। काका वही देहरी पर बैठ गए।
मनसुख - अब तुम रहने भी दो ।कुछ देश दुनिया का खबर रहे तब तो पता चले। मनसुख  अपने गमछे से मुह हाथ पोछता हुआ बोला।
काका- अब बेटा खोज खबर लेते भी रहते तो ऐसे ही रहते। दो जून रोटी का हिसाब रख लेते वही बहुत है।
इतने तो खोज खबर रखने वाले है। पर अपना स्थिति तो जस के तासँ है।
मनसुख- काका वो तो ठीक है पर का चल रहा है वो तो पता रखना है न। नहीं तो आगे भी वैसे ही चलते रहेगा। लगभग काका की बातों में सहमति की मुद्रा दिखाते हुए मनसुख बोला।
काका- खैर बता का कह रहा था कि गर्मी बहुत बद्ग गई है। कौन से गर्मी की बात कर रहा है। अब काका भी मनसुख की बात से सहमत दिख रहे।
मनसुख- फिर से वही सीमा पर अंदर घुस के अपने जवान पर हमला कर के मार दिए। पाकिस्तानी कभियो सुधरेगा नहीं। बहुत तनाव है।
काका - तो अपने सैनिक का कर रहे थे। वो कहे  नहीं वही पर टेंटुआ दबा दिए।
मनसुख- अब ई तो नहीं पता। शायद सरकार का आदेश नहीं होगा। मनसुख कुछ दुखी भाव से बोला।
काका- तो का सरकार खाली मरे के आदेश दिया है। काका की झुर्रियों में कुछ खिंचाव आ गया।
मनसुख- काले रेडियो में समाचार दे रहा था कि सरकार ने इसका घोर निंदा किया है।
काका- निंदा करे से का ओकरे नींद उड़ जाएगा । समाचार तो ऐसे ही सुना रहे हो। निंदा तो ओहो खूब किये रहे लेकिन तनिक मौन रहकर। काका के मुह पर उलाहना के भाव घिर गए। ई तो खूब मुखर है तो भी निन्दा और बयाने से काम चला रहे है।
मनसुख - न काका ऐसा नहीं है देखा नहीं पिछले दफा कैसे घुस के मारे थे । मनसुख के चेहरे पर कुछ गर्व के भाव भर आये।
काका- हाँ बस यही सब के सुना सुना के पेट भर दे। अरे तितर वा के संग बटेर बनला से काम चलेगा। बेचारे जो जा रहे है उनका घरे से पूछो। सब बातें के गोली चलावे में लागल है। अब जाओ और केक खा के आओ।
मनसुख- काका कोनो काम करे तो तुम खोट निकालन में ही लगे रहते हो।
काका- बेटा हम खाली भगवान् के भक्त है।
मनसुख- तू को अभी समझने में देर है। देख काका इसको डिप्लोमेसी कहते है। मुस्कुरा के मनसुख बोला।
काका- देख चार आखर पढ़के तू जो चाहे बोल लेकिन बेटा घर में बुलाके जांच करवाया का हमारे अधिकारी सब गुड़ गोबर है...। काका की त्योरियां चढ़ी जा रही थी।। जब मन हो जा के केक खा ले और जहाँ मन हो जा के गरिया दे । ऐसा नहीं होता है। कहते -कहते काका रुक गये।
मनसुख - तो काका का करि के चाही ??
काका,- अब ई तो काबिल लोग सब बताएगा ....देख नहीं रहा कल टिबिया में कैसे चिल्ला चिल्ला के पाकिस्तान को हरा दिया। बेटा ई पाकिस्तानियों भी सब जानता है ।आखिर दोनों सहोदरे हो न ....
इतना कहते कहते  काका की आँखे जाने कहाँ खो गया और मनसुख टुकुर टुकुर ताकने लगा।

मन की बात

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